मकीन चौखटों पे रातें अपनी काटते रहे, सड़क गली की ख़ाक छानते रहे

थे बिन-बुलाए अजनबी कि जिन का घर पे राज था ।

सजे सजाए कमरे उन के शब-कदे ।

वो सब्ज़ लॉन फूल की कियारियाँ ।

वसीअ’ सहन-ओ-साइबाँ थे उन के वास्ते मगर ।

ख़ुद अपने घर में अजनबी ।

मकीन चौखटों पे रातें अपनी काटते रहे ।

सड़क गली की ख़ाक छानते रहे ।

वो बिन-बुलाए अजनबी ।

गदेले बिस्तरों पे लज़्ज़त-ए-शब-ओ-सहर में मस्त मस्त थे ।

उसी तरह न जाने कितनी उम्र काटने के बा’द ।

रफ़्ता रफ़्ता सख़्त-ओ-सर्द चौखटों ने ।

नर्म-ओ-गर्म बिस्तरों की गुदगुदी का ज़ाइक़ा समझ लिया ।

दिमाग़-ओ-दिल की ख़ुश्क वादियों में ।

आरज़ू के आबशार गुनगुना उठे सियाह-बख़्त रात ।

शुऊर के जुनून-ए-शौक़ के चराग़ जल गए ।

चराग़ से कई चराग़ जल गए ।

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