वक़्त-ए-सफ़र जुदाई के लम्हात-ए-मुज़्महिल, इक बेवफ़ा की आँख का काजल भिगो गए

1. गजल – सूखी ज़मीं को याद के बादल भिगो गए ।

पलकों को आज बीते हुए पल भिगो गए ।

आँसू फ़लक की आँख से टपके तमाम रात ।

और सुब्ह तक ज़मीन का आँचल भिगो गए ।

माज़ी के अब्र टूट के बरसे कुछ इस तरह ।

मुद्दत से ख़ुश्क आँखों के जंगल भिगो गए ।

वक़्त-ए-सफ़र जुदाई के लम्हात-ए-मुज़्महिल ।

इक बेवफ़ा की आँख का काजल भिगो गए ।

मैं मंज़रों में खोया हुआ पर्बतों के था ।

आ कर किसी की याद के बादल भिगो गए ।

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