हरे पत्तो सुनहरी धूप की क़ुर्बत में ख़ुश रहना, मगर मुमकिन नहीं है एक सी हालत में ख़ुश रहना

हरे पत्तो सुनहरी धूप की क़ुर्बत में ख़ुश रहना ।

मगर मुमकिन नहीं है एक सी हालत में ख़ुश रहना ।

मगन रहते हैं ये बूढ़े शजर अपनी कथाओं में ।

उन्हें आता है अपने ज़ेहन की जन्नत में ख़ुश रहना ।

हम इंसानों को फिर जीने का मक़्सद ही नहीं मिलता ।

लिखा होता जो उस ने सब की ही क़िस्मत में ख़ुश रहना ।

ये आँसू चार दिन के हैं ये आँसू सूख जाएँगे ।

सिखा देंगे तुम्हें हालात हर सूरत में ख़ुश रहना ।

मैं अपने ज़ख़्म अक्सर इस लिए भी नोच लेता हूँ ।

कहीं शामिल न हो जाए मिरी आदत में ख़ुश रहना ।

सुकून-ए-दिल गँवा बैठोगे तुम फ़ितरत से लड़ने में ।

जो चाहो आफ़ियत अपने क़द-ओ-क़ामत में ख़ुश रहना ।

पुकारा उम्र को ख़ुशियों ने जब मसरूफ़ थे बेहद ।

समय से सीख लेते काश हम फ़ुर्सत में ख़ुश रहना ।

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