अगर उत्तर प्रदेश में नया जनसंख्या कानून लागू हुआ, तो क्या होंगी उम्मीदें और क्या होगा विवाद

 नई दिल्ली. भारत में सबसे अधिक आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश रविवार 11 जुलाई को नई जनसंख्या नीति 2021-2030 लॉन्च करने के लिए तैयार है, इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाता है. नई नीति के माध्यम से परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत जारी गर्भनिरोधक उपायों की पहुंच बढ़ाने और सुरक्षित गर्भपात के लिए उचित व्यवस्था उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा. इस मसौदा कानून को उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग द्वारा तैयार किया गया है जो कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के नतीजों पर आधारित है.


इस नीति के कई अहम बिंदुओं में से एक यह भी है कि इसके माध्यम से 11 से 19 वर्ष के बीच के किशोरों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के बेहतर प्रबंधन के अलावा बुजुर्गों की देखभाल के लिए व्यापक व्यवस्था भी की जाएगी. राज्य में दो-बच्चों के नियम को बढ़ावा देने के लिए मसौदा कानून के अंतर्गत मिलने वाले फायदे और नुकसान की एक सूची तैयार की गई है.

इस कानून में स्वैच्छिक नसबंदी ऑपरेशन करके दो-बच्चों के नियम को अपनाने वाले हर किसी को प्रोत्साहित करने का प्रावधान किया गया है फिर वो चाहे पति हो या पत्नी. इसमें मामूली ब्याज दरों पर घर बनाने या खरीदने के लिए आसान कर्ज और पानी, बिजली एवं हाउस टैक्स जैसी उपयोगिताओं के लिए शुल्क में छूट जैसी सुविधाएं मिलेंगी.


  

मसौदा कानून में यह भी कहा गया है कि कानून बनने के बाद जो कोई भी दो-बच्चे के नियम का उल्लंघन करता है, उसे सरकार द्वारा चलाए जा रहे सभी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित कर दिया जाएगा, वह स्थानीय निकायों के लिए चुनाव नहीं लड़ सकता है, वह राज्य सरकार के तहत सरकारी नौकरी के लिए आवेदन भी नहीं कर पाएगा, उसे सरकारी नौकरी में पदोन्नति नहीं मिल सकती है, उसका राशन कार्ड सिर्फ चार सदस्यों तक ही सीमित होगा और वह किसी भी प्रकार की सरकारी सब्सिडी प्राप्त करने के लिए अयोग्य होगा.


कानून कब लागू होगा?
राजपत्र (गजट) में प्रकाशित होने की तारीख से एक साल बाद नया कानून राज्य में लागू होगा. सबसे पहले कानून पर लोगों के सुझाव मांगे जाएंगे, जिसके बाद उन सुझावों पर कानून आयोग द्वारा फिर से विचार किया जाएगा, और यदि कोई बदलाव किया जाता है तो इसे फिर से लोगों के सामने रखा जाएगा.


नई जनसंख्या नीति क्यों लागू की जा रही है?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जागरूकता और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए सभी जरूरी प्रयास किए जाने चाहिए. उन्होंने कहा कि नई जनसंख्या नीति तैयार करते समय सभी समुदायों में जनसांख्यिकीय संतुलन (Demographic Balance) बनाए रखने, उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं की आसान उपलब्धता और उचित पोषण के माध्यम से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर तक लाने का प्रयास किया जाना चाहिए. नई नीति के उद्देश्यों को सतत विकास लक्ष्यों की भावना में समाहित किया जाना चाहिए. इसमें 2026 और 2030 के लिए दो चरणों में अलग-अलग मापदंडों पर लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं.


कौन से अन्य राज्य अपने दो-बच्चे का नियम लागू कर रहे हैं?
उत्तर प्रदेश के अलावा, असम सरकार राज्य विधानसभा के अगले महीने के बजट सत्र के दौरान इसे व्यापक रूप से लागू करने के लिए नया दो-बच्चा कानून (Two Child Legislation) ला सकती है. आधिकारिक सूत्रों ने कहा है कि कानून में यह प्रावधान किया गया है कि सिर्फ दो बच्चों वाले लोगों को ही सरकारी नौकरियों और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा.


कानून को लेकर क्यों हो सकता है विवाद?
संभल से समाजवादी पार्टी के विधायक इकबाल महमूद ने कानून को मुसलमानों के लिए साजिश करार दिया है. महमूद ने पीटीआई से कहा, “यह वास्तव में जनसंख्या नियंत्रण की आड़ में मुसलमानों पर हमला है.” इसके साथ ही यह कानूनन विधवा या फिर पति से अलग हो चुकी महिलाओं के पुनर्विवाह को भी प्रभावित करता है, पहले से विवाहित महिलाओं के लिए बच्चे पैदा करने को हतोत्साहित करने से उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और पुनर्विवाह की संभावना प्रभावित हो सकती है.


हम चीन की एक बच्चे की नीति से क्या सीख सकते हैं?
चीन ने 2015 में अपनी एक बच्चे की नीति को समाप्त कर दिया, जिससे दंपतियों को दो बच्चे पैदा करने की अनुमति मिल गई. बढ़ती उम्र और गिरती जन्म दर की चिंताओं के बीच चीन अब पूरी तरह से जन्म प्रतिबंधों को हटाने के लिए तेजी से काम कर रहा है. देश में तेजी से बढ़ रही जनसंख्या पर चिंता जाहिर करते हुए चीन ने 1979 में अपनी नीति पेश की थी.

सीएनएन ने बताया कि जनसंख्या नीति ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक चीन के लिए चुनौतियों खड़ी की हैं, जिसमें सालों से युवा आबादी में गिरावट आई है, जबकि 65 वर्ष से अधिक की आबादी का अनुपात लगभग 4% से बढ़कर लगभग 10% हो गया है. इस नीति ने लिंग भेदभाव की एक चिंताजनक प्रवृत्ति को भी जन्म दिया क्योंकि बेटा पैदा करने की इच्छा ने गर्भपात और शिशु-हत्या को बढ़ावा दिया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कपल का एकमात्र बच्चा लड़का ही हो. 2016 में चीन में प्रत्येक महिला के लिए 1.15 पुरुष थे, जो दुनिया में सबसे खराब लिंग अनुपात में से एक है. हालांकि, कन्या भ्रूण हत्या अभी भी भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है.