क्‍या केंद्र की मोदी सरकार ने मिड-डे मील की जगह अकाउंट में ट्रांसफर किया है कैश!

 केंद्र की मोदी सरकार ने सदन को बताया है कि कोविड-19 महामारी के चलते स्‍कूलों में दिए जाने वाले मिड-डे मील की जगह क्‍या कैश का फायदा लोगों को पहुंचाया गया है. सरकार की तरफ से एक सवाल के जवाब में इस बात बात की जानकारी दी गई है. आपको बता दें कि कोविड-19 महामारी की वजह से करीब डेढ़ साल से स्‍कूल बंद हैं और शिक्षा व्‍यवस्‍था खासी प्रभावित हुई है.

विपक्ष ने पूछा सवाल

सरकार से विपक्ष ने सवाल किया था कि क्‍या उसने मिड-डे मील की जगह कैश ट्रांसफर को प्राथमिकता दी है? अगर ऐसा हुआ है तो कितने बच्‍चों को इससे फायदा हुआ है और इसकी जानकारी अगर सरकार के पास है तो वो इसे साझा करे. इस सवाल का जवाब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की तरफ से दिया गया. उन्‍होंने सदन को बताया कि मिड-डे मील योजना के तहत साल 2020-2021 में 11.20 लाख स्‍कूलों में पढ़ने वाले करीब 11.80 करोड़ बच्‍चे नामांकित थे. वर्तमान समय में प्राथमिक और उच्‍च प्राथमिक स्‍तर पर प्रति बच्‍चा दिन में खाना पकाने की लागत 4.97 रुपए और 7.45 रुपए है.

सूखा राशन और दालें कराई मुहैया

उन्‍होंने आगे बताया कि कोविड महामारी की वजह से स्‍कूल बंद थे, सभी नामांकित बच्‍चे खाद्य सुरक्षा भत्‍ते के हकदार हैं जिसमें खाद्यान्‍न और खाना पकाने की लागत शामिल है. केंद्रीय मंत्री की मानें तो राज्‍यों और सभी संघ शासित राज्‍यों की तरफ से लाभार्थी के बैंक अकाउंट में नकद के जरिए खाना पकाने की लागत के भुगतान के साथ खाद्यान्‍न उपलब्‍ध कराया. वहीं बाकी राज्‍यों और संघ शासित राज्‍यों ने खाना पकाने की लागत के बराबर खाद्यान्‍न और सूखा राशन जैसे दालें आदि उपलब्‍ध कराई है.

9.65 करोड़ों बच्‍चों को मिड-डे मील

पिछले साल आई एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में औसतन रोजाना 9.65 करोड़ स्कूली बच्चे मिड-डे मील खाते हैं. लेकिन नई शिक्षा नीति के तहत अब उन्हें स्कूल में गर्मा-गर्म नाश्ता भी मिलेगा. रोजाना का नाश्ता कैसा होगा यह सुझाव एम्स, दिल्ली की कमेटी ने सरकार को दिया है. नाश्ते में किसी दिन मूंगफली, चना और गुड़ होगा तो किसी एक दिन बच्चों को अंडा-दूध भी दिया जाएगा. किचेन में हलवा बनाने का सुझाव भी कमेटी ने दिया है. गौरतलब रहे देशभर में एमडीएम खाने वाले बच्चों की पंजीकृत संख्या 13.10 करोड़ है, जबकि हर रोज खाने वाले बच्चों की संख्या 9.65 करोड़ होती है.

दोपहर के भोजन के लिए बच्‍चे जाते स्‍कूल

सरकारी स्कूलों के बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने के लिए एमडीएम के साथ अब नाश्ता भी शुरू किया जा रहा है. मोदी सरकार 2016 से इस दिशा में काम कर रही थी. एक सर्वे रिपोर्ट में सामने आया था कि 30 से 40 फीसदी से अधिक बच्चे इसलिए स्कूल जाते हैं, ताकि उन्हें दोपहर का भोजन मिल सके. इसी के चलते नाश्ता शामिल करने की योजना तैयार हुई. क्योंकि इसी रिपोर्ट में सामने आया था कि यह बच्चे पौष्टिक आहार न मिलने से कुपोषण के शिकार होते हैं. इसलिए नाश्ते में पौष्टिक आहार को शामिल किया जा रहा है.