पी चुके हैं शराब हम हर गली हर दूकान से, एक रिश्ता सा बन गया है शराब के ज़ाम से, पाये हैं ज़ख्म हमने इश्क़ में ऐसे, कि नफ़रत सी हो गयी है हमें इश्क़ के नाम से

हद से बढ़ जाये ताल्लुक तो ग़म मिलते हैं|

हम इसी वास्ते हर सख्स से कम मिलते हैं|

खुद पर भरोसा करना सिख़लो सहारा चाहे कितना ही,तकलीफे तो हजारो है इस ज़माने में ...

खुद पर भरोसा करना सिख़लो सहारा चाहे कितना ही

सच्चा हो एक ना एक दिन साथ छोड़ ही देता हैं

तकलीफे तो हजारो है इस ज़माने में |

बस कोई अपना नज़र अंदाज करे तो बर्दाश्त नहीं होती !!

जरा देखो तो, ये दरवाजे पर दस्तक किसने दी है!

‘इश्क’ हो तो कहना, अब दिल यहाँ नहीं रहता…

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