‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहें जिसे

सितारो को गिनना मुश्किल है,

किस्मत में जो लिखा हे वो मिटाना मुश्किल है,

आपको हमारी जरुरत है या नहीं,

पर आप की अहमियत लफ्जो में बताना मुश्किल है..मिस यू…

तनहा रहना तो सिख लिया,

पर कभी खुश ना रह पाएंगे,

तेरी दूरी तो सह लेगा ये दिल,

पर तेरे प्यार के बिना जी ना पाएंगे…

 

सितारो को गिनना मुश्किल है,किस्मत में जो लिखा है वो मिटाना मुश्किल है।

 

शायर : मिर्ज़ा ग़ालिब

आईना क्यूँ न दूँ के तमाशा कहें जिसे

ऐसा कहाँ से लाऊँ के तुझसा कहें जिसे

हसरत ने ला रखा तेरी बज़्म-ए-ख़्याल में

गुलदस्ता-ए-निगाह सुवेदा कहें जिसे

फूँका है किसने गोशे मुहब्बत में ऐ ख़ुदा

अफ़सून-ए-इन्तज़ार तमन्ना कहें जिसे

 

 

सर पर हुजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डलिये

वो एक मुश्त-ए-ख़ाक के सहरा कहें जिसे

है चश्म-ए-तर में हसरत-ए-दीदार से निहाँ

शौक़-ए-इनाँ गुसेख़ता दरिया कहें जिसे

दरकार है शिगुफ़्तन-ए-गुल हाये ऐश को

सुबह-ए-बहार पंबा-ए-मीना कहें जिसे

‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे

ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहें जिसे

 

 

रात के पहलु में तेरी याद क्यू है,

तू नहीं तो तेरा एह्सास क्यू है,

मैने तो बस तेरी ख़ुशी चाही थी,

ऐ जान पर तू आज तक,इतने ”दूर” क्यू हे

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