विशेष विवाह अधिनियम 1954 हिंदी में

भारत में सामाजिक और धार्मिक रूढ़िवादिता के कारण अंतरजातीय तथा अंतरधार्मिक विवाहों के लिये उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को दूर करने के लिये वर्ष 1954 में ‘विशेष विवाह अधिनियम को लागू किया गया था।यह अधिनियम वर्ष 1873 के विशेष विवाह अधिनियम को प्रतिस्थापित करता है। यह अधिनियम देश में अलग-अलग धर्मों से संबंधित लोगों को बगैर अपने धर्म में परिवर्तन किये ही विवाह पंजीकरण का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिनियम विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों पर भी लागू होता है। इस अधिनियम के तहत विवाह के पंजीकरण के लिये अधिनियम की धारा-4 में कुछ अनिवार्यताओं का निर्धारण किया गया है, जो निम्नलिखित हैं:

  • अधिनियम के तहत विवाह पंजीकरण के समय किसी भी पक्षकार का पति या पत्नी जीवित न हो। 
  • कोई भी पक्ष मानसिक विकार के परिणामस्वरूप विधिमान्य सहमति देने में असमर्थ न हो।
  • या विवाह की सहमति तो दे सकता हो परंतु इस हद तक मानसिक विकार से पीड़ित न हो कि वह विवाह अथवा संतानोत्पत्ति के अयोग्य हो।पुरुष की आयु 21 वर्ष (न्यूनतम) और महिला की आयु 18 वर्ष हो आदि

 

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दिक्क़तें:

  • सहमत वयस्कों के बीच वैवाहिक संबंधों को विनियमित (regulate) करने के लिये अनावश्यक कानूनी हस्तक्षेप न केवल संवैधानिक अधिकारों की गारंटी के खिलाफ होगा, बल्कि यह व्यक्तिगत (अनुच्छेद 21) और बुनियादी स्वतंत्रता की अवधारणा को भी क्षति पहुँचाता है।
  • बहुविवाह, बहुपत्नी प्रथा, अपहरण जैसे अपराधों से IPC या अन्य कानूनों की विभिन्न धाराओं के तहत निपटा जा सकता है।
  • असामाजिक तत्त्वों द्वारा लोगों का शोषण करने या अराजकता फैलाने के लिये ऐसे कानूनों का दुरुपयोग किया जा सकता है।

ज़रूरी बाते:

  • 21वीं सदी में भी देश में धर्म और जाति के नाम पर होने वाला भेदभाव एक बड़ी चिंता का विषय है, ऐसे में वर्तमान में समाज में लोगों में निजता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता (विवाह, धर्म का चुनाव या अन्य मामलों में भी) के संदर्भ में व्यापक जागरूकता लाने की आवश्यकता है।
  • विवाह अधिनियम से जुड़े कानूनों में अपेक्षित बदलाव के साथ और उन्हें लागू करने में होने वाली अनावश्यक देरी को दूर करने के विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिये। कानूनों या धार्मिक रीति-रिवाज़ों के दुरुपयोग के माध्यम से लोगों के शोषण को रोकने के लिये युवाओं को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिये।
  • भारत में विवाह से जुड़े कानूनों में व्याप्त जटिलता को दूर करने के लिये ‘समान नागरिक संहिता’ को अपनाया जाना बहुत ही आवश्यक है।

 

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