शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को मैं देखता रहा दरिया तरी रवानी को

हम तो फ़ना हो गये उसकी आँखे देख कर - शायरी

शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को

मैं देखता रहा दरिया तरी रवानी को

क्या कहूँ उस से कि जो बात समझता ही नहीं

वो तो मिलने को मुलाक़ात समझता ही नहीं.

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है

इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँडे

पत्थर की तरह बे हिस ओ बे जान सा क्यों है

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में

आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है.

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