किसी की याद में रोते नहीं हम, हमें चुपचाप जलना आ गया है,

जरुरी तो नहीं जीने के लिए सहारा हो,

जरुरी तो नहीं हम जिनके हैं वो हमारा हो,

कुछ कश्तियाँ डूब भी जाया करती हैं,

जरुरी तो नहीं हर कश्ती का किनारा हो।

जरुरी तो नहीं जीने के लिए सहारा हो,जरुरी तो नहीं हम जिनके है वो हमारा हो।

खामोशी से बिखरना आ गया है,

हमें अब खुद उजड़ना आ गया है,

किसी को बेवफा कहते नहीं हम,

हमें भी अब बदलना आ गया है,

किसी की याद में रोते नहीं हम,

हमें चुपचाप जलना आ गया है,

गुलाबों को तुम अपने पास ही रखो,

हमें कांटों पे चलना आ गया है।

वक़्त नूर को बेनूर कर देता है,

छोटे से जख्म को नासूर कर देता है,

कौन चाहता है अपनों से दूर रहना,

पर वक़्त सबको मजबूर कर देता है।

हमारा ज़िक्र भी अब जुर्म हो गया है वहाँ,

दिनों की बात है महफ़िल की आबरू हम थे,

ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर,

जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे।

Comments are closed.